भूमि पर ओजोन कैसे
LOCKDOWN के बीच इस GOOD NEWS, ओजोन लेयर की शुरू हुई हीलिंग .....!
By Bhavna Pandey
21 दिन के राष्ट्रव्यापी LOCKDOWN को अभी दो दिन ही हुए हैं कि आप अपनी बालकनी और खिड़कियों से झांककर इसका पॉजिटिव असर सीधे तौर पर ना केवल देख पा रहे होंगे बल्कि महसूस भी कर रहे होंगे। इन दिनों आसमान कुछ और नीला दिखाई दे रहा है, ऐसा शायद आपने कभी बचपन में अपनी छत से देखा हो। रात में अब शहरों में भी तारे साफ नजर आ रहे हैं। इंसानी हरकतें कम होने से पक्षी स्वछंद होकर उड़ रहे हैं।
पक्षियों की कई आवाजें अर्से बाद सुनाई पड़ रही हैं। हवा अपेक्षाकृत शुद्ध है और फूल पेड़ पर लगे-लगे ही मुरझा पा रहे हैं। विकास की अमानवीय गतिविधियां कम होने का सीधा असर प्रकृति पर दिखाई देता है और दुनिया भर के कई देशों में लॉकडाउन के बीच इस पूरी पृथ्वी के लिए एक अच्छी खबर आई है। पृथ्वी पर जीने के लिए सबसे जरूरी ओजोन की परत का जो क्षरण हुआ था, उसकी हीलिंग होना शुरू हुई है। हालांकि इसका अभी के लॉकडाउन से कोई लेना देना नहीं है। ओजोन परत को बचाने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत दशकों से किए जा रहे प्रयासों का ये नतीजा है।
ओजोन परत में हुए छेद की हो रही है हीलिंग
बता दें हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चलता है कि अटलांटिक के ऊपर ओजोन परत में छेद की हीलिंग तेजी से हो रही है। यह एक बड़ी खबर है क्योंकि पिछले दिनों सीएफसी और अन्य हानिकारक प्रदूषकों से ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचा था और उसमें बड़ा होल हो गया था। जिसको लेकर पूरी दुनिया चिंतित थी लेकिन पृथ्वी के दक्षिणी हिस्से में स्थित अटलांटिक के ऊपर बने ओजोन लेयर का छेद अब भर रहा है। इसका प्रमुख श्रेय 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को जाता हैं। ये प्रोट्रोकॉल एक अंतराष्ट्रीय संधि है। जिसका उद्देश्य ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थो के उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण हुआ ये बदलाव
बता दें वर्ष 2000 से पृथ्वी के ऊपर चलने वाली दक्षिणी गोलार्थ की तेज धारा में बह रही हवा जो ओजोन लेयर में छेद की वजह से पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव की तरफ जा रही थी अब न केवल वो बंद हो चुकी है बल्कि अब वह पलट गई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों का उत्पादन बंद होने से ओजोन लेयर में हीलिंग यानी ओजोन छिद्र ठीक होने लगा है।
अगर ऐसा हुआ तो 2060 तक भर जाएगा पूरा होल
इस अध्ययन में ये भी खुलासा हुआ है कि ओजोन परत अब वायुमंडल के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग गति से ठीक होने की उम्मीद है और अगर दुनिया मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का पालन करती है तो ओजोन की परत 2060 तक पूरी तरह से भर जाएगी और दुनिया के ऊपर मडरा रहा संकट समाप्त हो जाएगा।
ओजोन परत क्या है
ओज़ोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है जिसमें ओजोन गैस की सघनता अपेक्षाकृत अधिक होती है। ओज़ोन परत के कारण ही धरती पर जीवन संभव है क्योंकि ओज़ोन हमें सूर्य से आने वाली यूवी किरणों से बचाती है। यह परत सूर्य के उच्च आवृत्ति के पराबैंगनी प्रकाश की 93-99 % मात्रा अवशोषित कर लेती है, जो पृथ्वी पर जीवन के लिये हानिकारक है। पृथ्वी के वायुमंडल का 91% से अधिक ओज़ोन यहां मौजूद है। यह मुख्यतः स्ट्रैटोस्फियर के निचले भाग में पृथ्वी की सतह के ऊपर लगभग 10 किमी से 50 किमी की दूरी तक स्थित है, यद्यपि इसकी मोटाई मौसम और भौगोलिक दृष्टि से बदलती रहती है।
ओजोन परत में होल क्यों है पृथ्वी के लिए खतरा
By Bhavna Pandey
21 दिन के राष्ट्रव्यापी LOCKDOWN को अभी दो दिन ही हुए हैं कि आप अपनी बालकनी और खिड़कियों से झांककर इसका पॉजिटिव असर सीधे तौर पर ना केवल देख पा रहे होंगे बल्कि महसूस भी कर रहे होंगे। इन दिनों आसमान कुछ और नीला दिखाई दे रहा है, ऐसा शायद आपने कभी बचपन में अपनी छत से देखा हो। रात में अब शहरों में भी तारे साफ नजर आ रहे हैं। इंसानी हरकतें कम होने से पक्षी स्वछंद होकर उड़ रहे हैं।
पक्षियों की कई आवाजें अर्से बाद सुनाई पड़ रही हैं। हवा अपेक्षाकृत शुद्ध है और फूल पेड़ पर लगे-लगे ही मुरझा पा रहे हैं। विकास की अमानवीय गतिविधियां कम होने का सीधा असर प्रकृति पर दिखाई देता है और दुनिया भर के कई देशों में लॉकडाउन के बीच इस पूरी पृथ्वी के लिए एक अच्छी खबर आई है। पृथ्वी पर जीने के लिए सबसे जरूरी ओजोन की परत का जो क्षरण हुआ था, उसकी हीलिंग होना शुरू हुई है। हालांकि इसका अभी के लॉकडाउन से कोई लेना देना नहीं है। ओजोन परत को बचाने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत दशकों से किए जा रहे प्रयासों का ये नतीजा है।
ओजोन परत में हुए छेद की हो रही है हीलिंग
बता दें हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चलता है कि अटलांटिक के ऊपर ओजोन परत में छेद की हीलिंग तेजी से हो रही है। यह एक बड़ी खबर है क्योंकि पिछले दिनों सीएफसी और अन्य हानिकारक प्रदूषकों से ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचा था और उसमें बड़ा होल हो गया था। जिसको लेकर पूरी दुनिया चिंतित थी लेकिन पृथ्वी के दक्षिणी हिस्से में स्थित अटलांटिक के ऊपर बने ओजोन लेयर का छेद अब भर रहा है। इसका प्रमुख श्रेय 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को जाता हैं। ये प्रोट्रोकॉल एक अंतराष्ट्रीय संधि है। जिसका उद्देश्य ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थो के उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण हुआ ये बदलाव
बता दें वर्ष 2000 से पृथ्वी के ऊपर चलने वाली दक्षिणी गोलार्थ की तेज धारा में बह रही हवा जो ओजोन लेयर में छेद की वजह से पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव की तरफ जा रही थी अब न केवल वो बंद हो चुकी है बल्कि अब वह पलट गई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों का उत्पादन बंद होने से ओजोन लेयर में हीलिंग यानी ओजोन छिद्र ठीक होने लगा है।
अगर ऐसा हुआ तो 2060 तक भर जाएगा पूरा होल
इस अध्ययन में ये भी खुलासा हुआ है कि ओजोन परत अब वायुमंडल के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग गति से ठीक होने की उम्मीद है और अगर दुनिया मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का पालन करती है तो ओजोन की परत 2060 तक पूरी तरह से भर जाएगी और दुनिया के ऊपर मडरा रहा संकट समाप्त हो जाएगा।
ओजोन परत क्या है
ओज़ोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है जिसमें ओजोन गैस की सघनता अपेक्षाकृत अधिक होती है। ओज़ोन परत के कारण ही धरती पर जीवन संभव है क्योंकि ओज़ोन हमें सूर्य से आने वाली यूवी किरणों से बचाती है। यह परत सूर्य के उच्च आवृत्ति के पराबैंगनी प्रकाश की 93-99 % मात्रा अवशोषित कर लेती है, जो पृथ्वी पर जीवन के लिये हानिकारक है। पृथ्वी के वायुमंडल का 91% से अधिक ओज़ोन यहां मौजूद है। यह मुख्यतः स्ट्रैटोस्फियर के निचले भाग में पृथ्वी की सतह के ऊपर लगभग 10 किमी से 50 किमी की दूरी तक स्थित है, यद्यपि इसकी मोटाई मौसम और भौगोलिक दृष्टि से बदलती रहती है।
ओजोन परत में होल क्यों है पृथ्वी के लिए खतरा
बता दें 1980 में पहली बार इसका पता चला था कि सूर्य से पृथ्वी की रक्षा करने वाली ओजोन परत में छेद हो चुका है जो धीरे- धीरे बढ़ रहा है। समताप मंडल में मौजूद ओजाने मंडल सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें अलट्र वायलेट को अवशोषित करता है। अल्ट्रावायलेट विकिरण त्वचा कैंसर, मोलियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली को कम करने के साथ ही पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। इसलिए ओजोन को पृथ्वी का सुरक्षा कवच कहा जाता है।
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